Administrative turmoil at Jhunjhunu Medical College: Six specialist doctors resign, protests intensify

Administrative turmoil at Jhunjhunu Medical College: Six specialist doctors resign, protests intensify

झुंझुनूं जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था इस समय एक बड़े झटके से गुजर रही है। Jhunjhunu Medical College में कार्यरत छह विशेषज्ञ डॉक्टरों ने सामूहिक रूप से अपने प्रशासनिक और शैक्षणिक दायित्वों से हटने का फैसला लिया है। इस कदम ने न केवल कॉलेज के भीतर हलचल मचा दी है, बल्कि मरीजों और मेडिकल विद्यार्थियों के बीच भी चिंता की लहर दौड़ा दी है।

डॉक्टरों का आरोप है कि कॉलेज प्रशासन, खासतौर पर प्राचार्य के स्तर पर, ऐसे निर्णय लिए जा रहे हैं जो नियमों और स्थापित प्रक्रियाओं से मेल नहीं खाते। इसी असंतोष ने अब खुला रूप ले लिया है।

विवाद की जड़ क्या है?

मामले के केंद्र में है “डी-डिज़िग्नेशन” यानी पदनाम हटाने या बदलने का मुद्दा। विरोध कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि उन्हें उनके तयशुदा पद और जिम्मेदारियों से बिना उचित प्रक्रिया अपनाए हटाया गया या बदला गया।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह का फैसला लेने से पहले विभागीय अनुमति, वरिष्ठता का सम्मान और प्रशासनिक नियमों का पालन जरूरी होता है। लेकिन उनका दावा है कि इस मामले में इन सबको नजरअंदाज किया गया।

डॉक्टरों का मानना है कि इससे उनकी पेशेवर साख और वर्षों की मेहनत पर सीधा असर पड़ता है। यही वजह है कि उन्होंने इसे सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संस्थान की गरिमा से जुड़ा सवाल बताया है।

अचानक फैसले से बढ़ी अनिश्चितता

कॉलेज पहले से ही मरीजों के भारी दबाव और पढ़ाई की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा था। ऐसे में वरिष्ठ विशेषज्ञों का एक साथ पीछे हटना स्थिति को और जटिल बना सकता है।

अंदरखाने यह भी चर्चा है कि फैसलों की इस शैली ने फैकल्टी के बीच असुरक्षा का माहौल बना दिया है। कई लोग खुलकर बोल नहीं रहे, लेकिन असहजता साफ महसूस की जा रही है।

इस्तीफे के साथ चेतावनी

सिर्फ पद छोड़ना ही इस कहानी का अंत नहीं है। डॉक्टरों ने साफ संकेत दिए हैं कि अगर उनके साथ हुए फैसलों की समीक्षा नहीं की गई और कथित “मनमानी” वापस नहीं ली गई, तो वे व्यापक आंदोलन की राह पकड़ सकते हैं।

इस चेतावनी ने प्रशासन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। यदि विरोध बढ़ता है, तो इसका असर तीन बड़े मोर्चों पर पड़ सकता है।

मरीजों पर संभावित असर

विशेषज्ञ डॉक्टरों की भूमिका अस्पतालों में बेहद अहम होती है। अगर वे प्रशासनिक या अकादमिक काम से दूरी बनाते हैं या आंदोलन में उतरते हैं, तो सुपर-स्पेशलिटी सेवाओं में देरी हो सकती है। अपॉइंटमेंट, सर्जरी शेड्यूल और परामर्श प्रभावित होने का खतरा रहेगा।

स्थानीय लोगों की चिंता यही है कि इलाज की रफ्तार कहीं धीमी न पड़ जाए।

मेडिकल छात्रों की पढ़ाई पर प्रभाव

मेडिकल कॉलेज में वरिष्ठ डॉक्टर सिर्फ इलाज ही नहीं करते, वे पढ़ाते भी हैं। क्लिनिकल ट्रेनिंग, लेक्चर, प्रैक्टिकल—सब कुछ उनके अनुभव पर टिका होता है।

यदि वे सक्रिय भूमिका से पीछे हटते हैं, तो छात्रों के शैक्षणिक कैलेंडर पर असर पड़ना तय है। परीक्षा और ट्रेनिंग की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं।

प्रशासनिक तंत्र पर दबाव

यह पूरा विवाद कॉलेज के आंतरिक प्रबंधन पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रहा है। जब शीर्ष स्तर और वरिष्ठ फैकल्टी के बीच तालमेल बिगड़ता है, तो फैसले लेने की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है।

स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील सेवा में यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे, तो नुकसान व्यापक हो सकता है।

प्राचार्य की ओर से चुप्पी

Six specialist doctors left their posts अब तक प्राचार्य कार्यालय की तरफ से इन आरोपों पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यही चुप्पी चर्चाओं को और हवा दे रही है। फैकल्टी चाहती है कि प्रशासन खुलकर अपना पक्ष रखे और स्पष्ट करे कि जिन फैसलों पर विवाद है, वे किन नियमों के तहत लिए गए।

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