राजस्थान में हाल ही में एक ऐसा प्रशासनिक निर्णय लिया गया है, जिसने न केवल सियासी हलकों में चर्चा छेड़ दी है, बल्कि आम जनता को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। राज्य सरकार ने उन नौ नए जिलों को रद्द करने का ऐलान किया है, जिन्हें पिछली सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में मंजूरी दी थी। सवाल उठते हैं — क्या ये जिले वास्तव में जरूरी थे? और अगर नहीं, तो पहले इन्हें घोषित क्यों किया गया?
चुनाव से ठीक पहले की थी घोषणा, नई सरकार ने बताया ‘जल्दबाज़ी’ का फैसला
पिछली सरकार ने चुनाव से कुछ समय पहले ही नए जिलों और संभागों की घोषणा की थी। उस समय इसे एक ऐतिहासिक और प्रशासनिक सुधार बताया गया था। लेकिन अब वर्तमान सरकार का कहना है कि यह कदम बिना पर्याप्त सोच-विचार और संसाधनों के विश्लेषण के उठाया गया था।
राज्य के शिक्षा मंत्री जोगाराम पटेल ने साफ कहा कि यह फैसला न तो आर्थिक रूप से व्यावहारिक था और न ही प्रशासनिक दृष्टिकोण से संतुलित। उनका कहना है कि कुछ जिलों में ज़रूरी तहसीलें तक नहीं थीं, जो कि किसी जिले की आधारभूत आवश्यकता होती है।
कमी थी बुनियादी ढांचे की, नहीं था पर्याप्त बजट और स्टाफ
सरकार ने बताया कि इन नए जिलों के लिए:
- स्थायी भवन उपलब्ध नहीं कराए गए,
- विभागीय ऑफिसों के लिए न तो ज़मीन चिन्हित की गई और न ही निर्माण की योजना बनाई गई,
- केवल 18 विभागों में ही आंशिक रूप से पद सृजित किए गए।
सरकार का कहना है कि इतने बड़े निर्णय को लेते समय आवश्यक वित्तीय संसाधनों, जनसंख्या घनत्व, भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक आवश्यकताओं को अनदेखा किया गया, जिससे राज्य पर अनावश्यक भार बढ़ गया।
कमेटी की रिपोर्ट ने खोली कई परतें
इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने एक विशेष समिति गठित की थी। इस कमेटी ने उन सभी जिलों का मूल्यांकन किया जिन्हें हाल ही में घोषित किया गया था।
रिपोर्ट में साफ कहा गया कि इन जिलों की उपयोगिता स्पष्ट नहीं है और उनके लिए न तो ढांचा तैयार था, न ही मानव संसाधन की पर्याप्त व्यवस्था। इस रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने 9 जिलों को रद्द करने का बड़ा कदम उठाया।
जिलों की आवश्यकता का वैज्ञानिक परीक्षण नहीं हुआ
सरकार का यह भी कहना है कि यदि वास्तव में नए जिलों की ज़रूरत थी, तो पहले विस्तृत अध्ययन और परीक्षण होना चाहिए था। केवल चुनावी फायदे के लिए जिलों की घोषणा कर देना एक गंभीर प्रशासनिक चूक मानी जा रही है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि 1956 से 2023 तक राजस्थान में सिर्फ 7 नए जिले बनाए गए थे, जबकि एक बार में 17 जिलों की घोषणा कर देना न केवल अभूतपूर्व था, बल्कि अव्यवहारिक भी।
राजस्थान पर अनावश्यक बोझ डालते जिले
मंत्री जोगाराम पटेल के मुताबिक, ये जिले ना सिर्फ राज्य की मौजूदा आर्थिक स्थिति पर बोझ बन रहे थे, बल्कि ज़मीनी स्तर पर इनके अस्तित्व की कोई ठोस बुनियाद नहीं थी। जब तक संसाधन, स्टाफ और इन्फ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध नहीं होता, तब तक किसी भी जिले की घोषणा करना केवल कागज़ी काम ही रह जाता है।
सरकार का पक्ष: जनहित में लिया गया फैसला
इन सभी तर्कों को ध्यान में रखते हुए, राजस्थान सरकार ने नौ जिलों को रद्द करने का निर्णय लिया है। सरकार का दावा है कि यह कदम राज्य की दीर्घकालिक भलाई और प्रशासनिक कुशलता के लिए जरूरी था।
सरकार के इस फैसले पर कई मत हैं। कुछ लोग इसे समझदारी भरा कदम मान रहे हैं, तो कुछ इसे पिछली सरकार की योजनाओं को रोकने की राजनीति बता रहे हैं।
परिणाम: क्या ज़रूरत थी पहले जांच की?
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या किसी भी सरकार को इतने बड़े निर्णय लेने से पहले व्यापक चर्चा, डेटा एनालिसिस और जनता की ज़रूरतों पर ध्यान नहीं देना चाहिए?
राज्य का प्रशासनिक ढांचा तभी सशक्त हो सकता है जब फैसले सिर्फ राजनीतिक न होकर नीति-आधारित हों। अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में राजस्थान सरकार कैसे इस निर्णय को लागू करती है और राज्य के विकास को किस दिशा में ले जाती है।









