आंधी-तूफान की मार : मिनटों में बर्बाद हुई 27 बीघा जमीन पर 7 लाख की फसल!

rajasthan ke kisan

किसान हमारी धरती के असली सेवक हैं। उनकी मेहनत से ही हर घर में अनाज और सब्जियाँ पहुँचती हैं। लेकिन जब कुदरत अपना रौद्र रूप दिखाती है, तो उससे कोई नहीं बच सकता , की हुई पूरी मेहनत एक झटके में बर्बाद हो जाती है। हाल ही में एक ऐसे ही किसान की दर्दभरी कहानी सामने आई, जिसकी फसलें एक भयंकर तूफान में उजड़ गईं।

रात के सन्नाटे में आई तबाही

झुंझुनू ज़िले में रात के करीब 11:30 बजे एक खतरनाक तूफान आया। तेज़ बारिश और आंधी ने खेतों को तहस-नहस कर दिया। गोगड़ा खुर्द गांव के भी एक किसान की 27 बीघा जमीन पर खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूजा, लौकी और जुगनी जैसी सब्जियाँ लहलहा रही थीं। लेकिन कुछ ही मिनटों के इस तूफ़ान में सब मिट्टी में मिल गया।
किसान और किसान का परिवार अब क्या करे कैसे करे जैसी उलझनों से उभर नहीं पा रहा है।
जब किसान के साथ बात करने हमारे सावंदता पहुंचे तब वह अपनी परेशानी बताते बताते नम हो गए।

7 लाख की लागत, लेकिन अब सब बर्बाद

किसान ने बताया कि इस फसल पर उसने करीब 7-8 लाख रुपये लगाए थे। यह उनकी पहली बड़ी खेती थी, जिससे उन्हें उम्मीद थी की एक अच्छी कमाई हो सकती थी।
लेकिन प्रकृति के इस कहर ने उनके सपने चकनाचूर कर दिए।

मेहनत का मिट्टी में मिल जाना

फसल उगाने में केवल पैसे ही नहीं, बल्कि महीनों की मेहनत लगती है। ठंड में रात-रात जागकर पानी देना, खाद डालना, कीड़ों से बचाना—हर कदम पर संघर्ष होता है।
लेकिन अब, एक ही रात में सब खत्म हो गया। किसान के शब्दों में, “यह सिर्फ फसल का नुकसान नहीं, बल्कि हमारी उम्मीदों की भी मौत है।”

प्रशासन से कोई मदद नहीं

तूफान के बाद किसान को उम्मीद थी कि प्रशासन उसकी मदद करेगा। लेकिन कोई अधिकारी मौके पर नहीं आया। सिर्फ पटवारी और कृषि सुपरवाइजर ने रिपोर्ट बनाई, लेकिन मुआवजे या राहत पर कोई आश्वासन नहीं मिला।

किसानों की हालत कब सुधरेगी?

हर साल किसान किसी न किसी प्राकृतिक आपदा का शिकार होते हैं।
नुकसान का जायजा लेने के बाद भी मुआवजा मिलना मुश्किल होता है।
प्रशासन को जल्द से जल्द किसानों के लिए राहत योजना लागू करनी चाहिए।
अब आगे क्या?
तूफान के बाद सवाल ये है कि अब किसान क्या करे? फिर से मेहनत करे या कोई और रास्ता अपनाए? खेती से जीवन यापन करने वाले लाखों किसानों के लिए यह एक बड़ा सवाल है।

समाज की जिम्मेदारी

सरकार के साथ-साथ समाज को भी किसानों की मदद के लिए आगे आना चाहिए। वे सिर्फ अनाज उगाने वाले नहीं हैं, बल्कि देश की रीढ़ हैं। अगर हम उनकी मदद नहीं करेंगे, तो कौन करेगा?

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