पहलगाम आतंकी हमले के बीच एक जवान की निजी कहानी आई सामने
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए हालिया आतंकी हमले ने एक बार फिर भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव को नई हवा दे दी है। इस हमले के बाद भारत सरकार ने देश में रह रहे पाकिस्तानी नागरिकों के खिलाफ सख़्त रुख अपनाते हुए उन्हें वापस भेजने के आदेश दिए हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक अलग ही कहानी सामने आई है — वो है सीआरपीएफ से निलंबित जवान मुनीर अहमद की, जिन्होंने एक पाकिस्तानी महिला से शादी की और अब न्याय की गुहार लगा रहे हैं।
“शादी तय थी, कानून के मुताबिक सूचित भी किया था”
आज़ तक को दिए एक विशेष इंटरव्यू में मुनीर अहमद ने अपनी आपबीती साझा की। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी ममेरी बहन मीनाल खान से शादी की, जो पाकिस्तान की नागरिक हैं। यह रिश्ता परिवारों के बीच पहले से तय था, और दोनों परिवार 1947 के विभाजन से पहले से एक-दूसरे को जानते हैं।
मुनीर ने कहा कि उन्होंने विभाग को समय रहते शादी के बारे में सूचित किया था। पासपोर्ट की कॉपियां, शादी की तस्वीरें और स्थानीय अधिकारियों से शपथपत्र भी विभाग को सौंपे थे। बावजूद इसके, उन्हें नियमों की अवहेलना का दोषी ठहराते हुए निलंबित कर दिया गया।
सीआरपीएफ के आरोप और मुनीर का जवाब
सीआरपीएफ की ओर से जारी निलंबन आदेश में कहा गया है कि मुनीर ने पाकिस्तानी महिला से विवाह की जानकारी विभाग को नहीं दी और यह भी नहीं बताया कि उनकी पत्नी का वीज़ा कब समाप्त हुआ।
इस पर मुनीर साफ कहते हैं, “मैंने न केवल जानकारी दी, बल्कि नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) के लिए आवेदन भी किया। विभाग ने ही लिखकर दिया कि एनओसी की जरूरत नहीं है। फिर भी मुझे दोषी बनाया गया।” उन्होंने विभाग से हुए पत्राचार की प्रतियां भी साझा की हैं।
मुश्किल हालात में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से की थी शादी
मुनीर बताते हैं कि शादी सामान्य तरीके से नहीं हो पाई, क्योंकि उस समय उनके पिता की तबीयत बिगड़ गई थी और मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में इलाज चल रहा था। इस कारण दोनों परिवारों ने आपसी सहमति से वीडियो कॉल के जरिए निकाह किया।
शादी के बाद मीनाल खान का वीजा 14 मार्च को खत्म हो गया, लेकिन मुनीर ने 1 मार्च को ही लॉन्ग टर्म वीजा (LTV) के लिए आवेदन कर दिया था। उच्च अधिकारियों से उन्हें यह लिखित आश्वासन भी मिला था कि आवेदन लंबित रहते हुए मीनाल भारत में रह सकती हैं।
निलंबन के खिलाफ न्याय की लड़ाई
इस सबके बावजूद सीआरपीएफ ने मुनीर को निलंबित कर दिया। वह कहते हैं, “मैंने हर नियम का पालन किया। सरकार की ही गाइडलाइन के अनुसार वीज़ा प्रक्रिया में पारदर्शिता बरती। फिर भी मेरे साथ अन्याय हुआ।”
अब मुनीर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से न्याय की अपील कर चुके हैं। उन्होंने हाईकोर्ट का भी रुख किया, जहां से उन्हें अंतरिम राहत मिली है — उनकी पत्नी फिलहाल भारत में रह सकती हैं।
“हमला निंदनीय है, पाकिस्तान पर हो सख्त कार्रवाई”
जहां एक ओर मुनीर निजी संघर्षों से जूझ रहे हैं, वहीं उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा भी की। उन्होंने कहा, “मैं एक सच्चा भारतीय हूं। निर्दोषों की जान गई है। सरकार को पाकिस्तान के खिलाफ सख्त से सख्त कदम उठाने चाहिए।”
उनका सुझाव है कि भारत को पाकिस्तान की ओर जाने वाली जल आपूर्ति बंद करनी चाहिए, हवाई रास्ते सील करने चाहिए और आर्थिक प्रतिबंध लगाने चाहिए।
“निजी मामलों में थोड़ी संवेदनशीलता जरूरी”
मुनीर अहमद का मामला एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या व्यक्तिगत रिश्तों और सुरक्षा नीतियों के बीच संतुलन नहीं हो सकता? क्या कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए दोषी है क्योंकि उसकी निजी ज़िंदगी किसी जटिल कूटनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़ी है?
मुनीर की कहानी एक अपील है — न्याय, संवेदनशीलता और पारदर्शिता के लिए। जहां एक ओर देश की सुरक्षा सर्वोपरि है, वहीं यह भी ज़रूरी है कि इंसानी रिश्तों को समझने और जांचने का काम ईमानदारी और मानवता के साथ किया जाए।









