मंडावा (राजस्थान) – राजस्थान के ऐतिहासिक शहर मंडावा में सरकारी उदासीनता और प्रशासनिक लापरवाही की एक और तस्वीर सामने आई है। शहर के डंपिंग यार्ड में करोड़ों रुपये की लागत से लगाई गई आधुनिक कचरा रिसाइकल मशीनें महीनों से बंद पड़ी हैं, और धीरे-धीरे कबाड़ में तब्दील होती जा रही हैं। वहीं दूसरी ओर, आवारा जानवर कचरे के ढेर से प्लास्टिक खाकर अपनी जान गंवा रहे हैं।
सुंदरता के पीछे छिपी सच्चाई
मंडावा, जो अपनी भव्य हवेलियों और ऐतिहासिक धरोहरों के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है, आज गंदगी और अव्यवस्था के कारण चर्चा में है। शहर के डंपिंग यार्ड में कचरे के बड़े-बड़े ढेर लगे हुए हैं। गाय, कुत्ते और अन्य जानवर इन ढेरों में खाने की तलाश करते घूमते हैं। परंतु यह तलाश अक्सर उनकी जान पर भारी पड़ती है।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि कई बार उन्होंने प्रशासन से इस स्थिति की शिकायत की, लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई। उनके अनुसार, प्लास्टिक और हानिकारक कचरे के सेवन से कई गायों की जान जा चुकी है। यह दृश्य न केवल दुखद है, बल्कि प्रशासन की संवेदनहीनता को भी उजागर करता है।
मशीनें कब काम आएंगी?
डंपिंग यार्ड में स्थापित बड़ी मशीनें मूल रूप से कचरे को रिसाइकल करने के उद्देश्य से लाई गई थीं। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, इन मशीनों पर करोड़ों रुपये खर्च हुए। लेकिन विडंबना यह है कि ये मशीनें बीते कई महीनों से बंद पड़ी हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, इन मशीनों की खरीद के पीछे एक बड़ा सरकारी बजट खर्च हुआ था। अब सवाल उठता है कि अगर इतनी बड़ी राशि इन मशीनों पर खर्च की गई थी, तो क्या उनकी मरम्मत या रखरखाव की कोई योजना नहीं थी? मशीनें बेकार पड़ी हैं, कचरा बढ़ रहा है और जानवर मर रहे हैं – यह किसकी जवाबदेही है?
जनता में गुस्सा
इस अव्यवस्था से आस-पास रहने वाले लोग खासे परेशान हैं। क्षेत्र में बदबू, गंदगी और संक्रमण का खतरा बना हुआ है। गायों की मौतों ने भावनात्मक रूप से भी लोगों को झकझोर दिया है।
अमित मीणा, एक स्थानीय नागरिक, बताते हैं, “हर चुनाव में नेता आते हैं, वादे करते हैं, पर फिर गायब हो जाते हैं। जो गायें दूध देती हैं, उन्हें गौशालाओं में रखा जाता है, और जो नहीं देतीं, उन्हें बाहर छोड़ दिया जाता है। फिर ये गायें प्लास्टिक खाकर मरती हैं। क्या ये इंसानियत है?”
प्रशासन से अब उम्मीदें नहीं, जवाब चाहिए
लोगों की मांग है कि बंद पड़ी मशीनों को जल्द से जल्द चालू किया जाए और डंपिंग यार्ड की व्यवस्था सुधारी जाए। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर अब भी प्रशासन ने कोई कदम नहीं उठाया, तो आने वाले चुनावों में इसका असर देखने को मिलेगा।
स्थानीय समाजसेवियों का कहना है कि प्रशासन को सिर्फ मशीनें लगाकर अपना काम पूरा मान लेने की बजाय यह देखना होगा कि वे चल भी रही हैं या नहीं। वरना यह जनता के पैसों की बर्बादी है।
क्या कोई हल निकलेगा?
मंडावा की स्थिति प्रशासन के लिए एक चेतावनी है। एक ऐसा शहर, जिसे पर्यटन के लिहाज़ से संवारा जा सकता था, अब गंदगी और लापरवाही की मिसाल बन रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या जिम्मेदार अधिकारी जागते हैं या फिर ये मुद्दा भी कुछ दिनों की चर्चा के बाद भुला दिया जाएगा।
जनता का सवाल बिल्कुल जायज़ है – जब करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं, तो उसके बदले में साफ-सुथरा और व्यवस्थित शहर क्यों नहीं मिल रहा?









