झुंझुनूं में ओलावृष्टि ने मचाई तबाही: खेत बर्बाद, किसान बेबस

झुंझुनूं में ओलावृष्टि ने मचाई तबाही: खेत बर्बाद, किसान बेबस

2 घंटे तक रोई महिला | रसगुल्ले जैसे ओलों से तबाही, खेत बने तालाब |

झुंझुनूं जिले में हाल ही में आई भीषण ओलावृष्टि ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया। खेतों में लहलहाती फसलें चंद मिनटों में बर्बाद हो गईं और किसान अपने सपनों को टूटते देख बेबस रह गए। दो घंटे तक लगातार गिरे गुलाब जामुन जैसे बड़े ओलों ने न सिर्फ फसलें तबाह कीं, बल्कि किसानों के आर्थिक हालात को भी चरमरा कर रख दिया।

प्राकृतिक कहर की कहानी: दो घंटे की तबाही ने छीने सपने

स्थानीय पत्रकार निशांत ने इस भयावह मंजर को अपनी आंखों से देखा। वह बताते हैं, “मेरे जीवन में मैंने कभी इतने बड़े ओले नहीं देखे। ऐसा लग रहा था मानो आसमान खुद किसानों के दर्द में रो रहा हो। खेतों में जो भी खड़ा था, वह तहस-नहस हो गया।”

किसान मोहनलाल सैनी की पीड़ा: मेहनत बर्बाद, उम्मीद टूटी

इस आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं किसान मोहनलाल सैनी, जिन्होंने 9 बीघा जमीन पर प्याज की फसल उगाई थी। फसल अच्छी होने की पूरी उम्मीद थी। उन्होंने ₹2 लाख का निवेश किया, 400 मजदूरों को काम पर लगाया और अतिरिक्त बीज भी खरीद रखे थे।

लेकिन इस कहर ने उनकी उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया। सैनी बताते हैं, “90 प्रतिशत फसल तबाह हो चुकी है। ओलों ने प्याज को इतना नुकसान पहुंचाया है कि वह अब बाजार में बिकने लायक ही नहीं रही। सारी मेहनत और पूंजी डूब गई।”

ओलों का प्रभाव: खेत बने तालाब, प्याज सड़ने लगी

तस्वीरें बताती हैं कि ओलावृष्टि ने प्याज की बाहरी परत को बुरी तरह नष्ट कर दिया, जिससे वह जल्दी सड़ने लगी। खेतों में पानी भर जाने से फसलें जमीन में ही सड़ गईं। कई जगहों पर प्याज की बोरियों पर भी मिट्टी की परत चढ़ गई है।

मुनाफा नहीं, अब नुकसान की चिंता

मोहनलाल की योजना थी कि इस फसल से उन्हें ₹8 लाख तक की आमदनी होगी। 400 मजदूरों की लागत ₹4 लाख थी। यानी शुद्ध ₹4 लाख का लाभ मिल सकता था। लेकिन अब उल्टा उन्हें ₹4 लाख का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

वे कहते हैं, “जो प्याज मेरी कमाई का जरिया बनने वाली थी, वो अब मेरे लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गई है।”

प्रशासन से कोई मदद नहीं, किसान खुद लड़ रहे हैं जंग

इस त्रासदी के 24 घंटे बीत चुके हैं, लेकिन अब तक कोई सरकारी अधिकारी – न पटवारी, न तहसीलदार – मौके पर नहीं पहुंचा। सैनी नाराज होकर कहते हैं, “हमने सरकार से मदद की उम्मीद की थी, लेकिन अब लगता है हम अकेले हैं। कोई हमारी सुध लेने नहीं आया।”

पत्रकार निशांत भी प्रशासन की उदासीनता पर सवाल उठाते हैं, “इतना बड़ा नुकसान हुआ है और सरकार की तरफ से एक भी व्यक्ति नहीं आया है। ये दुखद है।”

आखिरी उम्मीद: मीडिया से गुहार

अब किसान और पत्रकार मिलकर मीडिया के माध्यम से अपनी बात सरकार तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। निशांत बताते हैं, “हम मीडिया से अपील कर रहे हैं कि इस तबाही की तस्वीरें और किसानों की आवाज सरकार तक पहुंचाई जाए।”

सैनी की आंखों में थोड़ी उम्मीद की झलक है। वे कहते हैं, “अगर सरकार खुद खेतों की हालत देखे, तो शायद हमें मुआवजा और मदद मिल सके।”

संवेदना और मदद की दरकार

झुंझुनूं की धरती आज कराह रही है। वो किसान जो देश का पेट भरते हैं, आज खुद भूख और कर्ज के डर में जी रहे हैं। इस समय उन्हें सिर्फ आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सम्मान की भी आवश्यकता है।

निशांत अंत में कहते हैं, “ये केवल प्याज की फसल नहीं थी, ये इन किसानों के सपने थे, उम्मीदें थीं। हमें इन्हें केवल आंकड़ों की नजर से नहीं देखना चाहिए, बल्कि इंसानियत के नजरिए से समझना चाहिए।”

अब देखना यह है कि क्या सरकार इन किसानों की सुध लेती है या फिर ये आवाजें खेतों में ही दबकर रह जाएंगी।

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