झुंझुनू में घोड़ीवारा बालाजी मंदिर के पास अतिक्रमण हटाने पर हंगामा, विरोध के बीच चली प्रशासन की कार्रवाई

झुंझुनू में घोड़ीवारा बालाजी मंदिर के पास अतिक्रमण हटाने पर हंगामा

सर फटा ,पटाखे बजे,अतिक्रमण या साजिश, प्रशासन पर लगाएं मिलीभगत के आरोप | देखे ग्राउंड रिपोर्ट

झुंझुनू (राजस्थान) — शहर के घोड़ीवारा बालाजी मंदिर के पास शनिवार को उस वक्त माहौल गर्मा गया जब प्रशासन ने अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोज़र चलवाया। मंदिर के सामने सरकारी ज़मीन पर बने कुछ निर्माणों को गिराने की कोशिश की गई, लेकिन जैसे ही कार्रवाई शुरू हुई, कुछ स्थानीय लोग विरोध में उतर आए, जिससे तनाव फैल गया।

प्रशासन की तरफ से क्या कहा गया?

प्रशासन का साफ कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह से अवैध अतिक्रमण के खिलाफ की गई थी। अधिकारियों के मुताबिक, मंदिर के आस-पास की सरकारी ज़मीन पर कुछ लोगों ने कब्ज़ा कर लिया था, जिससे रास्ता बाधित हो रहा था और आम लोगों को चलने-फिरने में परेशानी हो रही थी।

कार्रवाई के दौरान कुछ लोगों ने पटाखे फोड़े और विरोध जताया, जिससे मौके पर हालात थोड़े तनावपूर्ण हो गए।

ग्रामीणों के आरोप: “प्रशासन कर रहा है पक्षपात”

वहीं, दूसरी तरफ स्थानीय ग्रामीणों ने प्रशासन पर मिलीभगत और पक्षपात का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि कार्रवाई कुछ खास लोगों के इशारे पर की जा रही है और जिनके निर्माण तोड़े गए, उनके पास कोर्ट का स्टे ऑर्डर भी था, जिसे नजरअंदाज़ कर दिया गया।

ग्रामीणों का यह भी दावा है कि प्रशासन कुछ लोगों के साथ मिलकर पूरे मामले को मनमाने तरीके से अंजाम दे रहा है।

सरपंचों की राय बंटी हुई

इस मुद्दे पर क्षेत्र के अलग-अलग सरपंचों की राय एक जैसी नहीं है। कुछ सरपंचों का कहना है कि अवैध कब्ज़े हटाना ज़रूरी है ताकि रास्ते साफ हो सकें और लोगों को सुविधा मिले। वहीं, अन्य सरपंचों का मानना है कि प्रशासन को पहले लोगों को नोटिस देना चाहिए था और उनकी बात सुनकर ही कोई कदम उठाना चाहिए था।

अतिक्रमण हटाने के पक्ष में तर्क:

  • रास्ते खुलेंगे, आवाजाही आसान होगी
  • आम जनता को राहत मिलेगी
  • दुर्घटनाओं की संभावना घटेगी

अतिक्रमण के विरोध में तर्क:

  • बिना नोटिस के अचानक कार्रवाई
  • कोर्ट के आदेश की अनदेखी
  • प्रशासन की मिलीभगत का आरोप

दुकानदार का पक्ष: “मेरे पास वैध कागज़ हैं”

जिस दुकान को तोड़ा गया, उसके मालिक का कहना है कि उनके पास दुकान का कानूनी किरायानामा मौजूद है और उन्होंने कोई अवैध निर्माण नहीं किया। उनका आरोप है कि प्रशासन बिना किसी ठोस कारण के उनकी दुकान गिरा रहा है।
वे कहते हैं कि उन्होंने कोर्ट से स्टे ऑर्डर भी लिया हुआ है, लेकिन अधिकारियों ने उसे कोई महत्व नहीं दिया।

प्रशासन का जवाब: “हमें कोर्ट से कोई स्टे नहीं मिला”

प्रशासन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनके पास कोर्ट से कोई स्टे ऑर्डर नहीं पहुँचा है। अधिकारियों का दावा है कि वे सिर्फ अवैध कब्ज़ों को हटा रहे हैं और इस कार्रवाई में किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया है। उनका कहना है कि पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार ही की जा रही है।

मामला अब भी सुलझा नहीं

फिलहाल यह विवाद थमता नज़र नहीं आ रहा। ग्रामीण और प्रशासन के बीच बातचीत जारी है, लेकिन अभी तक कोई ठोस हल नहीं निकल पाया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस विवाद का कोई शांतिपूर्ण समाधान निकलता है या मामला और उलझता है।

आपकी राय क्या है?
क्या प्रशासन की कार्रवाई जायज़ थी या लोगों का विरोध वाजिब? नीचे कमेंट करके ज़रूर बताएं

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