देश की सुरक्षा व्यवस्था को झकझोर देने वाले बहुप्रचारित नौसेना जासूसी प्रकरण में आखिरकार अदालत ने अपना अंतिम फैसला सुना दिया। करीब छह वर्ष तक चले जांच और कानूनी कार्यवाहियों के बाद एनआईए की विशेष अदालत ने राजस्थान के दो युवकों—अशोक कुमार और विकास कुमार—को दोषी मानते हुए लगभग छह वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई है। यह मामला उस बड़े जासूसी नेटवर्क का हिस्सा था, जिसने सोशल मीडिया के माध्यम से भारतीय नौसेना से जुड़ी गोपनीय जानकारियाँ पाकिस्तान के एजेंटों तक पहुँचाने की कोशिश की थी।
विशाखापट्टनम में चले इस केस का फैसला न केवल जांच एजेंसियों की बड़ी सफलता माना जा रहा है, बल्कि यह इस बात का भी संकेत है कि देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों पर न्यायिक व्यवस्था कितना सख्त रुख अपनाती है। अदालत ने दोनों आरोपियों पर 5,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है, जिसे न भरने पर एक वर्ष की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी।
पूरी कहानी : कैसे उजागर हुई जासूसी की साज़िश
इस संवेदनशील मामले की शुरुआत वर्ष 2019 में तब हुई थी, जब आंध्र प्रदेश पुलिस की खुफिया शाखा को नौसेना से जुड़े कुछ संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी मिली। शुरुआती जांच में कई ऐसे डिजिटल संकेत मिले जिनसे पता चलता था कि कुछ युवक व्हाट्सऐप, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पाकिस्तानी हैंडलरों से संपर्क में हैं।
इसके बाद केस को गंभीरता से लेते हुए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को इसकी कमान सौंप दी गई और यहीं से शुरू हुआ ‘ऑपरेशन डॉल्फ़िन्स नोज़’—एक व्यापक खुफिया कार्रवाई, जिसने इस जासूसी गैंग का चेहरा बेनकाब कर दिया। इस ऑपरेशन के नाम का संबंध विशाखापट्टनम के प्रसिद्ध समुद्री चट्टानी ढांचे ‘डॉल्फ़िन्स नोज़’ से है, जो नौसेना की गतिविधियों का अहम केंद्र माना जाता है।
जांच एजेंसी ने पकड़े गए आरोपियों—अशोक कुमार और विकास कुमार—के मोबाइल फोन, चैट हिस्ट्री, कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल लेन-देन की जांच की। इन सबूतों ने स्पष्ट कर दिया कि आरोपियों ने आर्थिक लाभ के लालच में भारतीय नौसेना से संबंधित संवेदनशील जानकारियाँ बाहरी एजेंटों को भेजीं।
ये जानकारियाँ नौसेना के जहाज़ों की मूवमेंट, रणनीतिक गतिविधियों और अन्य गोपनीय सैन्य सूचनाओं से जुड़ी थीं, जिनका लीक होना देश की सुरक्षा के लिए बेहद खतरनाक हो सकता था।
अदालत में क्या हुआ : सबूतों ने बदल दिया पूरा खेल
एनआईए ने विशेष अदालत में जो साक्ष्य प्रस्तुत किए, वे इतने पुख्ता थे कि आरोपियों के पक्ष में कोई भी दलील टिक नहीं पाई। कॉल डेटा, चेटिंग रिकॉर्ड, डिजिटल भुगतान के सबूत और सोशल मीडिया संवादों ने इस बात की पुष्टि कर दी कि दोनों युवक लंबे समय तक पाकिस्तानी इंटेलिजेंस एजेंसियों के संपर्क में थे।
अदालत ने माना कि दोनों ने जानकारी ‘जबरदस्ती’ नहीं बल्कि ‘लालच’ में साझा की। यह भी बताया गया कि जासूसी नेटवर्क में कुल छह लोग शामिल थे, जिनमें अब तक कई आरोपियों को सजा सुनाई जा चुकी है। यह फैसला उसी लगातार चल रही कार्रवाई का एक और महत्वपूर्ण चरण है।
विशेष अदालत ने दोनों को पाँच वर्ष ग्यारह महीने की कठोर कैद की सजा दी—जो इस तरह के मामलों में क़ानून के तहत निर्धारित अधिकतम दंड के करीब है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि “राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोपरि है और इससे समझौता करने वालों को कठोरतम दंड दिया जाना चाहिए।”
राष्ट्रीय सुरक्षा पर बड़ा संदेश
यह फैसला सिर्फ दो लोगों की सजा भर नहीं है, बल्कि उन सभी के लिए चेतावनी है जो डिजिटल माध्यमों के जरिए देश की सुरक्षा से समझौता करने की कोशिश करते हैं। अदालत का यह निर्णय इस बात का स्पष्ट संकेत है कि
भारत किसी भी प्रकार की जासूसी गतिविधि को बर्दाश्त नहीं करेगा और दोषियों को कड़ी सजा दी जाएगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया के माध्यम से जासूसी नेटवर्क चलाए जाने का यह मामला अन्य मामलों से अलग है, क्योंकि यह दिखाता है कि किस तरह आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर दुश्मन देश सूचनाएँ हासिल करने का प्रयास कर रहा है। इसी कारण जांच एजेंसी ने डिजिटल सबूतों की भूमिका को प्रमुख माना और अदालत में इन्हें मजबूत तरीके से पेश किया।
अब आगे क्या?
Indian Naval Espionage Case भले ही अशोक और विकास को सजा मिल गई हो, लेकिन एनआईए की जांच अभी पूरी तरह खत्म नहीं मानी जा रही है। एजेंसी के अधिकारी बताते हैं कि कई विदेशी हैंडलर अभी भी जांच के दायरे में हैं और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि जासूसी नेटवर्क की जड़ें वास्तव में कितनी गहरी थीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केस आने वाले समय में ऐसे मामलों की जांच के लिए मिसाल के रूप में देखा जाएगा। साथ ही, यह सुरक्षा एजेंसियों को इस बात के लिए भी सचेत करता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर की जाने वाली जासूसी को रोकने के लिए लगातार सतर्कता और तकनीकी उन्नति की जरूरत है।









