नवलगढ़। तकनीक के इस दौर में अपराध का तरीका भी तेजी से बदल रहा है। ताजा मामला नवलगढ़ से सामने आया है, जहां एक स्थानीय व्यक्ति को तथाकथित “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर 26.90 लाख रुपये की ठगी का शिकार बनाया गया। साइबर अपराधियों ने खुद को केंद्रीय जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर उसे ₹500 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में फंसाने की धमकी दी। मामले की शिकायत मिलते ही नवलगढ़ पुलिस ने तकनीकी जांच शुरू की और करीब 800 किलोमीटर दूर सूरत (गुजरात) तक पैसों के लेन-देन की कड़ी को ट्रैक करते हुए एक अहम आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
कैसे रचा गया मनोवैज्ञानिक जाल
पीड़ित के अनुसार, उसे एक दिन अचानक फोन कॉल आया। कॉल करने वाले खुद को केंद्रीय जांच एजेंसी का अधिकारी बता रहे थे। आवाज में सख्ती और शब्दों में कानूनी धाराओं का डर था। कॉल करने वालों ने दावा किया कि उसका नाम ₹500 करोड़ के एक बड़े मनी लॉन्ड्रिंग घोटाले में सामने आया है और वह जांच के दायरे में है।
घबराए पीड़ित को वीडियो कॉल पर आने के लिए मजबूर किया गया। यहीं से शुरू हुआ तथाकथित “डिजिटल अरेस्ट” का खेल। अपराधियों ने उसे लगातार वीडियो कॉल पर बनाए रखा, यह कहकर कि यह एक “गोपनीय जांच” है और उसे किसी से बात करने की अनुमति नहीं है। उसे परिवार और दोस्तों से दूर रहने की हिदायत दी गई।
डर, शर्मिंदगी और कानूनी कार्रवाई के भय ने उसे मानसिक रूप से जकड़ लिया। अपराधियों ने भरोसा दिलाया कि यदि वह अपने बैंक खातों का “वेरिफिकेशन” करवा ले और रकम अस्थायी रूप से बताए गए खातों में ट्रांसफर कर दे, तो उसका नाम जांच से हटा दिया जाएगा। इसी दबाव में उसने अलग-अलग खातों में कुल 26.90 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए।
जब तक उसे ठगी का एहसास हुआ, तब तक काफी देर हो चुकी थी।
सूरत तक पहुंची जांच की कड़ी
मामले की शिकायत मिलते ही नवलगढ़ पुलिस हरकत में आई। साइबर सेल की मदद से पैसों के डिजिटल ट्रेल की पड़ताल शुरू की गई। बैंक खातों, आईपी एड्रेस और लेन-देन के रिकॉर्ड खंगाले गए।
जांच में सामने आया कि ठगी की रकम कई तथाकथित ‘म्यूल अकाउंट्स’ यानी फर्जी या किराए के खातों के जरिए आगे बढ़ाई गई। इन खातों का संचालन एक संगठित नेटवर्क द्वारा किया जा रहा था। पैसों की कड़ी गुजरात के सूरत शहर तक जा पहुंची।
पुलिस की एक विशेष टीम सूरत रवाना की गई। स्थानीय पुलिस के सहयोग से एक संदिग्ध को हिरासत में लिया गया, जिसे इस पूरे नेटवर्क की वित्तीय व्यवस्था संभालने वाला प्रमुख कड़ी माना जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि गिरफ्तार व्यक्ति ऐसे गिरोह का हिस्सा है, जो ठगी की रकम को विभिन्न खातों के माध्यम से घुमाकर असली स्रोत छिपाने में माहिर है।
बढ़ते “डिजिटल अरेस्ट” मामलों पर चिंता
यह घटना कोई अकेली नहीं है। देशभर में “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर ठगी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। साइबर अपराधी केंद्रीय एजेंसियों जैसे सीबीआई या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का नाम लेकर लोगों को डराते हैं। कानूनी कार्रवाई, गिरफ्तारी और बदनामी का भय दिखाकर वे पीड़ितों से मोटी रकम ऐंठ लेते हैं।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि असली जांच एजेंसियां कभी भी वीडियो कॉल के जरिए किसी को गिरफ्तार नहीं करतीं और न ही किसी मामले को दबाने या सत्यापन के नाम पर तत्काल पैसे ट्रांसफर करने को कहती हैं।
पुलिस की सख्त चेतावनी और अपील
नवलगढ़ पुलिस ने इस मामले के बाद आम लोगों के लिए विशेष चेतावनी जारी की है:
- कोई भी सरकारी या जांच एजेंसी वीडियो कॉल पर “गिरफ्तारी” या “डिजिटल अरेस्ट” नहीं करती।
- किसी भी कानूनी प्रक्रिया में तत्काल पैसे ट्रांसफर करने की मांग नहीं की जाती।
- यदि ऐसा कोई कॉल आए, तो घबराएं नहीं। तुरंत कॉल काट दें।
- राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर तुरंत शिकायत दर्ज कराएं।
पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया है कि जांच अभी जारी है। गिरोह के अन्य सदस्यों की पहचान की जा रही है और कोशिश की जा रही है कि ठगी गई रकम का अधिक से अधिक हिस्सा बरामद किया जा सके।
सामाजिक और मानसिक प्रभाव
इस तरह की ठगी सिर्फ आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पीड़ित को मानसिक आघात भी देती है। अचानक खुद को किसी बड़े अपराध में आरोपी बताए जाने का डर, परिवार की चिंता और सामाजिक बदनामी का भय—ये सभी भावनाएं मिलकर व्यक्ति को कमजोर बना देती हैं। साइबर अपराधी इसी मानसिक दबाव का फायदा उठाते हैं।
Digital Arrest Scam विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल साक्षरता और जागरूकता ही इस तरह के अपराधों से बचाव का सबसे बड़ा हथियार है। लोगों को यह समझना होगा कि कानून की प्रक्रिया पारदर्शी और औपचारिक होती है, न कि मोबाइल स्क्रीन पर दी जाने वाली धमकियों के जरिए।









