राजस्थान में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन इसी राज्य के रेगिस्तानी इलाके फलोदी से सामने आई घटनाएं इन दावों पर गहरे सवाल खड़े कर रही हैं। यहां हाल के दिनों में चार नवजात बच्चियों को जन्म के कुछ ही घंटों बाद ठंड में लावारिस छोड़ दिया गया। इन घटनाओं में सबसे भयावह तस्वीर उस बच्ची की है, जिसे सर्द रात में कीड़ों से घिरा हुआ पाया गया। यह दृश्य न केवल इंसानियत को शर्मसार करता है, बल्कि समाज की उस मानसिकता को भी उजागर करता है, जहां आज भी बेटी का जन्म बोझ माना जाता है।
सर्द रात और मासूम जिंदगियां
फलोदी क्षेत्र में जब कड़ाके की ठंड पड़ रही थी और तापमान तेजी से गिर रहा था, उसी दौरान अलग-अलग स्थानों पर चार नवजात बच्चियों को छोड़ दिए जाने की खबरें सामने आईं। ये घटनाएं रात के अंधेरे में हुईं, जब चारों ओर सन्नाटा था और मदद की कोई तत्काल उम्मीद नहीं थी।
एक बच्ची की हालत ने हर किसी को झकझोर दिया। स्थानीय लोगों ने जब उसे देखा तो वह सांस लेने के लिए संघर्ष कर रही थी और उसके नन्हे शरीर पर कीड़े रेंग रहे थे। यह दृश्य देखने वालों की आंखें नम हो गईं और दिल दहल उठा। ग्रामीणों ने बिना देर किए पुलिस और चिकित्सा विभाग को सूचना दी।
स्थानीय लोगों की पीड़ा और गुस्सा
जिन लोगों ने इन बच्चियों को देखा, उनके शब्दों में गहरा दर्द और आक्रोश साफ झलक रहा था। एक स्थानीय निवासी ने कहा, “यह सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि हमारी सोच पर लगा एक काला धब्बा है। कोई मां-बाप अपनी बेटी को इस हाल में कैसे छोड़ सकता है?”
लोगों का कहना है कि अगर समय पर इन बच्चियों को न देखा जाता, तो शायद वे ठंड और भूख के कारण अपनी जान गंवा देतीं। सौभाग्य से, चारों नवजातों को समय रहते अस्पताल पहुंचा दिया गया, जहां डॉक्टरों की टीम उनकी देखभाल में जुटी हुई है।
अस्पताल में जिंदगी की जंग
चिकित्सा अधिकारियों के अनुसार, सभी बच्चियों को नवजात गहन चिकित्सा इकाई (NICU) में रखा गया है। ठंड के कारण उन्हें सांस और शरीर के तापमान से जुड़ी समस्याएं थीं। डॉक्टरों का कहना है कि फिलहाल उनकी स्थिति स्थिर है, लेकिन पूरी तरह खतरे से बाहर आने में समय लगेगा।
नर्सिंग स्टाफ लगातार उनकी निगरानी कर रहा है। अस्पताल में काम कर रहे एक डॉक्टर ने बताया कि “इतनी छोटी उम्र में इस तरह की लापरवाही बच्चों के लिए बेहद खतरनाक होती है। ये बच्चियां सौभाग्यशाली हैं कि समय रहते मिल गईं।”
अकेली घटना नहीं, बल्कि शर्मनाक सिलसिला
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि फलोदी की यह घटना कोई अकेला मामला नहीं है। हाल ही में राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे पांच मामले सामने आए हैं, जिन्हें वे बेहद शर्मनाक मानते हैं। इनमें कहीं नवजात बच्चियों को छोड़ने की घटनाएं हैं, तो कहीं नाबालिगों के साथ हिंसा की खबरें।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सब गहरी सामाजिक समस्या की ओर इशारा करता है। आज भी कई परिवारों में बेटे को प्राथमिकता दी जाती है और बेटी को बोझ समझा जाता है। कानून और जागरूकता अभियानों के बावजूद यह मानसिकता पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है।
कानून है, लेकिन डर नहीं?
भारत में कन्या भ्रूण हत्या और बच्चों को छोड़ने के खिलाफ सख्त कानून मौजूद हैं। इसके बावजूद इस तरह की घटनाओं का सामने आना प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक निगरानी दोनों पर सवाल खड़े करता है।
पुलिस ने इन मामलों में अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली जा रही है और अस्पतालों के जन्म रिकॉर्ड भी खंगाले जा रहे हैं, ताकि बच्चियों के माता-पिता या अभिभावकों का पता लगाया जा सके।
सिर्फ पुलिस कार्रवाई काफी नहीं
महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों का कहना है कि केवल पुलिस केस दर्ज कर देना समाधान नहीं है। एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, “यह समस्या सिर्फ कानून से नहीं सुलझेगी। हमें यह समझना होगा कि आखिर 2026 में भी कोई परिवार बेटी को ठंड में छोड़ने को मजबूर क्यों महसूस करता है।”
उनका मानना है कि ग्रामीण इलाकों में जागरूकता, सामाजिक सहयोग और सरकारी योजनाओं की सही जानकारी पहुंचाना बेहद जरूरी है, ताकि किसी को ऐसा कदम उठाने की जरूरत ही न पड़े।
समाज के सामने बड़ा सवाल
Abandonment of newborn girls in Phalodi फलोदी की ये चार मासूम बच्चियां आज अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रही हैं, लेकिन यह घटना पूरे राजस्थान और देश के लिए आत्ममंथन का विषय है। क्या हम सच में बेटियों को समान अधिकार और सम्मान दे पा रहे हैं?
इन घटनाओं ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कई बेटियों के लिए संघर्ष जीवन की शुरुआत से ही शुरू हो जाता है। अब जरूरत सिर्फ खबरें पढ़ने या अफसोस जताने की नहीं, बल्कि सोच और व्यवहार में ठोस बदलाव लाने की है।









