झुंझुनू (राजस्थान):
एक पिता का बेटा, जो बेहतर जीवन की तलाश में दुबई गया था, अब ताबूत में लौटा है। और वो भी 22 दिन बाद। अजरुद्दीन, उदयपुर वाटी के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे। 23 अप्रैल को दुबई में काम के दौरान हुए हादसे में उनकी मौत हो गई, लेकिन परिवार को उनका शव 14 मई को मिला। इस दौरान परिवार ने हर संभव दरवाज़ा खटखटाया, हर कागज जुटाया और हर जवाब का इंतज़ार किया… लेकिन सिस्टम की धीमी रफ्तार ने उनकी उम्मीदों को तोड़ दिया।
दुबई में रोजगार की तलाश, हादसा बन गया अंत
अजरुद्दीन ने हाल ही में दुबई की बिलादीन ग्रुप नामक कंपनी में बतौर स्प्रे मैन काम करना शुरू किया था। ये कंपनी जबलाली में स्थित है और अजरुद्दीन शारजाह में ड्यूटी पर थे। वह सड़क पर टैंकर के साथ काम कर रहे थे, तभी एक टैंकर में ब्लास्ट हो गया। यही हादसा उनकी मौत की वजह बना।
अजरुद्दीन ने इस कंपनी में काम शुरू किए मात्र 17-18 दिन ही हुए थे। उन्हें कंपनी द्वारा आईडी कार्ड और अन्य दस्तावेज भी दिए गए थे। यानी वे पूरी तरह कानूनी रूप से नियुक्त थे।
कैसे मिली परिवार को खबर?
23 अप्रैल की रात, अजरुद्दीन की कंपनी ने परिवार को कॉल कर एक हादसे की सूचना दी। लेकिन बातों में अस्पष्टता थी। एक बार बताया गया कि हादसा शाम को हुआ, फिर कॉल रात 1:40 बजे आई। उस कॉल के बाद फोन काट दिया गया। अगले दिन उनके चाचा मुकीम अली को फोन आया कि अजरुद्दीन घायल हैं। जब उन्होंने अस्पताल जाकर मिलने की कोशिश की, तो उन्हें बताया गया कि हालत गंभीर है।
फिर 25 अप्रैल की सुबह 5:15 बजे, उस कॉल ने पूरे परिवार की दुनिया बदल दी—“अजरुद्दीन की मौत हो चुकी है।”
20 दिन की जद्दोजहद: शव पाने की लड़ाई
इसके बाद शुरू हुआ सबसे दर्दनाक और परेशान करने वाला सिलसिला—शव को भारत वापस लाने का।
परिवार ने दुबई और सऊदी अरब में अपने जान-पहचान के लोगों से संपर्क किया। कंपनी से बार-बार जानकारी ली, लेकिन हर बार एक नया बहाना दिया गया—कभी पुलिस जांच, कभी CID केस, कभी डेथ सर्टिफिकेट और गेट पास की कमी।
18 दिन बीत गए, और आखिरकार 14 मई की शाम को कंपनी ने शव भारत भेजा। टिकट और जरूरी दस्तावेज परिवार को मुहैया कराए गए। लेकिन आर्थिक हालत खराब होने की वजह से परिवार खुद शव लेने नहीं जा सका।
10 मिनट की मुलाकात, अंतिम विदाई
शव मिलने के बाद, परिवार ने उसे केवल 10 मिनट के लिए देखा। फिर स्थानीय कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार कर दिया गया।
इतना लंबा इंतज़ार और फिर इतनी जल्दी विदाई—यह पीड़ा शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
मुआवजे का क्या?
अब तक कंपनी की ओर से कोई मुआवजा नहीं मिला है। कंपनी ने आश्वासन दिया है कि वे मुआवजा देंगे, लेकिन कब और कितना—इसकी जानकारी अभी नहीं है।
परिवार इस दर्द से टूट चुका है। उनका कहना है कि कम से कम जब कोई विदेश में हादसे का शिकार होता है, तो उसका शव समय पर परिवार तक पहुंचाना कंपनी की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए।
चाचा की अपील: “जो बाहर काम करते हैं, उनका साथ दो”
अजरुद्दीन के चाचा मुकीम अली भी विदेश में काम करते हैं। उन्होंने कहा,
“जब तक हम काम करते हैं, हम कंपनी के लिए हैं। लेकिन जब कुछ होता है, तो हमें बेसहारा छोड़ दिया जाता है। अगर किसी के साथ हादसा हो जाए, तो समाज और कंपनी को मिलकर शव को घर लाना चाहिए।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि अजरुद्दीन ड्यूटी पर था, लिहाजा यह कंपनी की ज़िम्मेदारी बनती है कि वो उसके परिवार की मदद करे।
मुख्य बिंदु (Key Highlights):
- अजरुद्दीन की मौत 23 अप्रैल को दुबई में एक टैंकर ब्लास्ट में हुई।
- शव को भारत आने में लगे 22 दिन; 14 मई को मिला शव।
- परिवार ने कंपनी से लगातार संपर्क किया लेकिन मिला सिर्फ टालमटोल।
- अब तक कोई मुआवजा नहीं मिला, कंपनी ने बस आश्वासन दिया।
- अजरुद्दीन केवल 17-18 दिन पहले ही कंपनी से जुड़े थे।
परिणाम
ये कहानी सिर्फ अजरुद्दीन की नहीं, बल्कि उन हजारों भारतीय मजदूरों की है जो रोज़गार के लिए विदेश जाते हैं और वहां मुश्किल हालातों का सामना करते हैं। क्या हमारे सिस्टम को ऐसे मामलों में तेज़ और संवेदनशील नहीं होना चाहिए? क्या कंपनियों की जिम्मेदारी तय नहीं होनी चाहिए? और सबसे जरूरी, क्या हमारे प्रवासी कामगारों की जान की कोई कीमत नहीं?









