झुंझुनूं की सड़कों पर आज का दिन सामान्य नहीं था। सुबह से ही जिले के अलग-अलग इलाकों से किसान, खेत मजदूर और श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधि जुटने लगे थे। हाथों में झंडे, बैनर और तख्तियां थीं, जिन पर सरकार की हालिया अंतरराष्ट्रीय समझौतों को लेकर नाराजगी साफ पढ़ी जा सकती थी। प्रदर्शन उस समय चरम पर पहुंच गया जब भीड़ ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पुतला फूंक दिया। यह कदम केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि उस आशंका का सार्वजनिक इज़हार था जो स्थानीय किसान वैश्विक प्रभाव और बदलती आर्थिक नीतियों को लेकर महसूस कर रहे हैं।
बढ़ती बेचैनी का इज़हार
प्रदर्शन का आयोजन क्षेत्रीय किसान समूहों और श्रमिक यूनियनों ने मिलकर किया था। उनका कहना है कि केंद्र सरकार जिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों की दिशा में आगे बढ़ रही है, उनसे देश की खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है। भीड़ में शामिल लोगों का मानना था कि इन नीतियों का झुकाव बड़ी कंपनियों की तरफ ज्यादा है, जबकि छोटे और मध्यम किसान खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
कई प्रदर्शनकारी ढोल-नगाड़ों के साथ पहुंचे। नारे लग रहे थे—किसान विरोधी नीतियां वापस लो, मजदूरों के हक सुरक्षित करो। माहौल में गुस्सा भी था और चिंता भी। यह चिंता आने वाले समय की थी, जब उन्हें लग रहा है कि उनकी रोजी-रोटी पर बाहरी ताकतों का असर बढ़ सकता है।
पुतला दहन क्यों बना प्रतीक
डोनाल्ड ट्रंप का पुतला जलाना इस विरोध का सबसे चर्चित दृश्य रहा। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस वैश्विक आर्थिक ढांचे के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ज्यादा ताकत मिलती है। उनके अनुसार, भारत जैसे देश में जहां खेती अब भी बड़ी आबादी की जीवनरेखा है, वहां ऐसी नीतियां छोटे उत्पादकों को हाशिये पर धकेल सकती हैं।
एक किसान नेता ने भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि यह विरोध चेतावनी है—अगर किसानों की बात नहीं सुनी गई तो आंदोलन और तेज होगा। उनके भाषण के दौरान लोगों ने जोरदार समर्थन में हाथ उठाए और नारे लगाए।
“कॉरपोरेट गुलामी” का डर
प्रदर्शन स्थल पर मौजूद नेताओं ने बार-बार “कॉरपोरेट गुलामी” शब्द का इस्तेमाल किया। उनका आरोप था कि जिन समझौतों पर चर्चा हो रही है या जो लागू हैं, वे बड़ी कंपनियों के हित में तैयार किए गए हैं। छोटे किसानों को बाजार की मार झेलनी पड़ेगी, जबकि मुनाफा बड़े खिलाड़ियों के हाथ में जाएगा।
एक बुजुर्ग किसान ने कहा, “हमें विकास से दिक्कत नहीं है, लेकिन ऐसा विकास नहीं चाहिए जिसमें हमारी जमीन, हमारी मेहनत और हमारी आज़ादी छिन जाए।” उनके आसपास खड़े लोगों ने सहमति में सिर हिलाया। कई युवा किसान भी मौजूद थे, जो मानते हैं कि अगर सुरक्षा तंत्र कमजोर हुआ तो भविष्य में खेती करना और कठिन हो जाएगा।
परंपरागत सहारे खत्म होने की आशंका
ग्रामीण समुदाय में यह भावना मजबूत दिखी कि अब तक जो व्यवस्थाएं उन्हें बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाती रही हैं, वे धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद, सहकारी ढांचे—इन सबको लेकर लोगों के मन में सवाल हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय दबाव में नीतियां बदलीं, तो सबसे पहले असर गांवों पर पड़ेगा।
श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी अपनी चिंता जताई। उनका तर्क था कि जब कृषि क्षेत्र दबाव में आएगा, तो उससे जुड़े मजदूरों की स्थिति भी प्रभावित होगी। रोजगार की स्थिरता और आय की सुरक्षा दोनों दांव पर लग सकती हैं।
ज्ञापन सौंप कर रखी मांग
पुतला दहन के अलावा यूनियनों ने एक औपचारिक ज्ञापन भी तैयार किया। इसमें सरकार से मांग की गई कि वह मौजूदा नीति दिशा पर पुनर्विचार करे और भारतीय किसानों की संप्रभुता को प्राथमिकता दे। ज्ञापन में स्थानीय सुरक्षा उपायों को मजबूत करने, छोटे उत्पादकों के हितों की रक्षा करने और किसी भी समझौते से पहले व्यापक संवाद की जरूरत पर जोर दिया गया।
नेताओं ने कहा कि वे बातचीत के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन फैसला लेते समय जमीनी आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
शांतिपूर्ण समापन, लेकिन संदेश सख्त
Jhunjhunu farmers protest काफी देर तक नारेबाजी और भाषणों का दौर चलता रहा। पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से खत्म हुआ। हालांकि भीड़ धीरे-धीरे छंट गई, लेकिन जो संदेश पीछे रह गया वह साफ था—झुंझुनूं का ग्रामीण समाज वैश्विक व्यापारिक बदलावों को लेकर सतर्क है और उसे अपनी आर्थिक सुरक्षा पर किसी तरह का समझौता मंजूर नहीं।
किसानों का कहना है कि अगर भविष्य में उन्हें लगा कि उनकी स्वतंत्रता या आजीविका पर खतरा है, तो वे फिर से सड़कों पर उतरने से नहीं हिचकिचाएंगे।








