Eight days of ‘digital arrest’, fraud of Rs 26.90 lakh

Eight days of 'digital arrest', fraud of Rs 26.90 lakh

साइबर अपराध का एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें एक स्थानीय नागरिक को आठ दिनों तक मानसिक दबाव और डर के माहौल में रखकर करीब 26.90 लाख रुपये की ठगी कर ली गई। ठगों ने खुद को केंद्रीय जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर पीड़ित को तथाकथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा और उसकी जीवन भर की कमाई हड़प ली।

यह मामला न केवल तकनीकी धोखाधड़ी का उदाहरण है, बल्कि यह भी दिखाता है कि किस तरह डर, भ्रम और अलगाव का इस्तेमाल कर आम लोगों को शिकार बनाया जा रहा है।

फर्जी जांच से शुरू हुआ डर का खेल

पीड़ित की परेशानी तब शुरू हुई, जब उसके मोबाइल फोन पर एक कॉल आई। कॉल करने वालों ने खुद को किसी केंद्रीय जांच एजेंसी का वरिष्ठ अधिकारी बताया। उन्होंने दावा किया कि पीड़ित का नाम 538 करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सामने आया है।

ठगों ने इतनी पेशेवर भाषा और कानूनी शब्दों का इस्तेमाल किया कि पीड़ित को उनकी बातों पर शक करने का मौका ही नहीं मिला। कॉल के दौरान फर्जी दस्तावेजों और कथित केस नंबरों का हवाला देकर उसे यह यकीन दिलाया गया कि मामला बेहद गंभीर है और किसी भी तरह की लापरवाही उसे जेल पहुंचा सकती है।

‘डिजिटल अरेस्ट’ का झांसा

ठगों ने पीड़ित से कहा कि जांच की गोपनीयता बनाए रखने के लिए उसे तुरंत ‘डिजिटल गिरफ्तारी’ में रखा जा रहा है। इसके तहत उसे निर्देश दिया गया कि वह लगातार वीडियो कॉल पर रहे और किसी भी स्थिति में परिवार, दोस्तों या किसी बाहरी व्यक्ति से संपर्क न करे।

आठ दिनों तक पीड़ित को लगातार वीडियो कॉल पर निगरानी में रखा गया। इस दौरान उसे डराया गया कि अगर उसने कॉल काटी या किसी से बात की, तो उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाएगा। इसी डर के कारण पीड़ित पूरी तरह मानसिक दबाव में आ गया और किसी से मदद लेने की हिम्मत नहीं कर सका।

खातों की ‘जांच’ के नाम पर आर्थिक लूट

जब पीड़ित पूरी तरह डर और तनाव में आ चुका था, तब ठगों ने अगला कदम उठाया। उन्होंने कहा कि यह साबित करने के लिए कि पीड़ित का पैसा मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा नहीं है, उसके बैंक खातों की ‘वेरिफिकेशन’ जरूरी है।

इसके बाद पीड़ित को अलग-अलग बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने के निर्देश दिए गए। कहा गया कि जांच पूरी होते ही पूरी रकम वापस कर दी जाएगी। दबाव और डर के कारण पीड़ित ने बिना सवाल किए उनकी बात मान ली।

आठ दिनों के भीतर पीड़ित ने अपने तीन अलग-अलग बैंक खातों से कुल 26.90 लाख रुपये ठगों द्वारा बताए गए खातों में ट्रांसफर कर दिए।

ठगी का एहसास, जब कॉल हुई बंद

जब पूरी रकम ट्रांसफर हो गई, तो अचानक कॉल करने वाले तथाकथित अधिकारी संपर्क से बाहर हो गए। न कॉल उठाई गई, न कोई जवाब मिला। यहीं से पीड़ित को यह एहसास हुआ कि वह किसी बड़े साइबर ठगी का शिकार हो चुका है।

इसके बाद पीड़ित ने हिम्मत जुटाकर पूरे मामले की जानकारी अपने परिवार को दी और फिर साइबर अपराध सेल से संपर्क किया।

पुलिस और साइबर सेल की कार्रवाई

मामले की शिकायत मिलने के बाद साइबर क्राइम सेल ने जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों का कहना है कि कॉल करने वालों के डिजिटल फुटप्रिंट, बैंक खातों और पैसे के लेन-देन की ट्रेल को ट्रैक किया जा रहा है।

पुलिस ने एक बार फिर साफ किया है कि कोई भी सरकारी एजेंसी—चाहे वह पुलिस हो, ईडी, सीबीआई या कोई अन्य विभाग—कभी भी वीडियो कॉल के जरिए गिरफ्तारी नहीं करती और न ही जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने को कहती है।

बढ़ता ‘डिजिटल अरेस्ट’ स्कैम

साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के महीनों में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर ठगी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। ठग लोगों के मन में कानून का डर पैदा करके उन्हें मानसिक रूप से तोड़ देते हैं और फिर आर्थिक शोषण करते हैं।

इस तरह के मामलों में ठग अक्सर गोपनीयता, तत्काल कार्रवाई और जेल की धमकी जैसे हथकंडों का इस्तेमाल करते हैं, ताकि पीड़ित सोचने-समझने की स्थिति में न रहे।

सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव

fake investigation agency call यह मामला एक कड़ी चेतावनी है कि साइबर अपराधी अब पहले से कहीं ज्यादा चालाक और खतरनाक हो चुके हैं। विशेषज्ञों और पुलिस की सलाह साफ है—
अगर किसी भी व्यक्ति को ‘डिजिटल अरेस्ट’, मनी लॉन्ड्रिंग या किसी जांच के नाम पर कॉल आए, तो तुरंत कॉल काटें और इसकी सूचना स्थानीय पुलिस या राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर दें।

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