भारत-पाकिस्तान सीमा से एक संवेदनशील मामला सामने आया, जिसमें सीमा सुरक्षा बल (BSF) का जवान पूर्णम कुमार शॉ गलती से पाकिस्तान की सीमा में चला गया था। 21 दिनों के तनाव और प्रयासों के बाद, जवान की सुरक्षित वापसी ने पूरे देश को राहत दी है।
कैसे हुई घटना की शुरुआत?
यह घटना 23 अप्रैल को हुई, जब पश्चिम बंगाल के ऋषरा निवासी बीएसएफ जवान पूर्णम कुमार शॉ, पंजाब के फिरोज़पुर सेक्टर में ड्यूटी के दौरान अनजाने में पाकिस्तान की सीमा में प्रवेश कर गए। उस समय वह अपनी वर्दी में थे और उनके पास सर्विस राइफल भी मौजूद थी। बताया जा रहा है कि वह कुछ किसानों के साथ एक पेड़ की छांव में आराम कर रहे थे, तभी यह चूक हो गई।
गौरतलब है कि इस घटना से कुछ ही समय पहले कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमला हुआ था, जिसके बाद भारत ने 7 मई को पाकिस्तान में आतंकियों के ठिकानों के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की शुरुआत की थी।
बीएसएफ ने नहीं छोड़ी कोई कसर
जवान को वापस लाने के लिए बीएसएफ ने कूटनीतिक और मैदानी स्तर पर पूरा जोर लगा दिया। उन्होंने पाकिस्तानी रेंजर्स के साथ लगातार संपर्क बनाए रखा।
- फ्लैग मीटिंग्स: बीएसएफ और पाक रेंजर्स के बीच कम से कम 6 बार फ्लैग मीटिंग्स हुईं।
- सीमा पर संकेत: बीएसएफ जवानों ने प्रतिदिन 3-4 बार सीटी और झंडों की मदद से पाक रेंजर्स को संकेत भेजे, ताकि बातचीत शुरू की जा सके।
- कूटनीतिक पहल: डीजीएमओ (डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशन्स) स्तर की बैठक में भी इस मुद्दे को उठाया गया।
जवान की पहचान और पारिवारिक पृष्ठभूमि
पूर्णम कुमार शॉ, पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के ऋषरा के रहने वाले हैं। वह बीएसएफ की नियमित ड्यूटी पर तैनात थे। घटना के बाद, उनकी पत्नी चंडीगढ़ पहुंचीं और बीएसएफ अधिकारियों से मुलाकात कर अपने पति की वापसी की गुहार लगाई।
पाकिस्तान से रिहाई
लगभग 504 घंटे (21 दिन) पाकिस्तान में रहने के बाद, पूर्णम कुमार शॉ को आखिरकार पाकिस्तानी अधिकारियों ने रिहा कर दिया। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान के पास उन्हें ज्यादा दिनों तक रोकने का कोई ठोस आधार नहीं था, और बीएसएफ का निरंतर दबाव काम आया।
बीएसएफ ने यह साफ कर दिया था कि वह तब तक प्रयास करना नहीं छोड़ेगी, जब तक जवान को वापस नहीं लाया जाएगा। इसी संकल्प और दबाव का असर था कि पाकिस्तान को अंततः जवान को रिहा करना पड़ा।
क्यों अहम है यह घटना?
यह घटना सिर्फ एक जवान की गलती नहीं, बल्कि दो देशों के बीच रिश्तों और संवाद की परख भी थी। बीएसएफ ने इस मामले को बेहद पेशेवर और मानवीय तरीके से हैंडल किया। उन्होंने हर स्तर पर जवान की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास किया।
यह भी दिखाता है कि हमारी सुरक्षा एजेंसियां सिर्फ सीमा की रक्षा ही नहीं करतीं, बल्कि अपने साथियों को हर हाल में सुरक्षित वापस लाने के लिए हरसंभव कोशिश करती हैं।
परिणाम
पूर्णम कुमार शॉ की वतन वापसी न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए सुकून की खबर है। बीएसएफ की कार्यशैली और उनकी कोशिशें सराहना योग्य हैं। यह घटना हमें यह याद दिलाती है कि हमारी सीमाओं की रक्षा करने वाले जवानों के लिए देश हर स्थिति में उनके साथ खड़ा है।









